" सहकारिता केवल स्वामित्व का एक प्रारूप ही नहीं है बल्कि यह सीमित साधनों वाले व्यक्तियों के उत्थान के लिए एक आंदोलन है।"
सहकारी समिति क्या है:-
Sahkari samiti इसका अभिप्राय लोगों के उस ऐच्छिक संघ से है जो सदस्यों की भलाई के उद्देश्य से इकट्ठे होते हैं।
सहकारी संगठन की विशेषताएं:-
Sahkari Sangathan की निम्नलिखित विशेषताएं हैं:-
स्वैच्छिक सदस्यता:- यह व्यक्तियों का एक स्वैच्छिक संगठन होता है, अर्थात किसी भी व्यक्ति को Sahkari Samiti का सदस्य बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति जब चाहे इस का सदस्य बन सकता है तथा किसी भी समय सूचना देकर इसकी सदस्यता को छोड़ सकता है। सदस्यता छोड़ने पर नियमानुसार सदस्य की पूंजी वापस कर दी जाती है।
यहां विशेष बात यह है कि कोई भी सदस्य अपने अंश को किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं कर सकता है। इनकी सदस्यता प्राप्त करने के लिए धर्म, जाति आदि का कोई बंधन नहीं है अर्थात सभी लोगों को इसकी सदस्यता प्राप्त करने का पूरा अधिकार है। लेकिन कुछ परिस्थितियों में सदस्यता को एक विशेष ग्रुप तक सीमित कर दिया जाता है।
वैधानिक स्थिति:- सदस्यों का कोई भी संघ अपने नाम के साथ सहकारी शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता है, जब तक कि वह सहकारी समिति अधिनियम 1912 अथवा संबंधित राज्य सहकारी समिति अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण ना करवा लें। सहकारी समिति का पंजीकरण हो जाने के बाद इसका अस्तित्व इसके सदस्यों से अलग हो जाता है। अर्थात समिति अपने नाम से संपत्ति रख सकती है, अनुबंध कर सकती है, समिति पर मुकदमा किया जा सकता है और यह भी अन्य पक्षकारों पर मुकदमा कर सकती है।
सीमित दायित्व:- इस संगठन के सदस्यों का दायित्व उनके अंशों अथवा उनके द्वारा की गई गारंटी तक सीमित होता है।
नियंत्रण:- इनका नियंत्रण स्वयं सदस्यों द्वारा प्रजातंत्रात्मक आधार पर किया जाता है। इनके नियंत्रण के लिए एक प्रबंध समिति बना दी जाती है जिसके सदस्यों का चुनाव आम सभा में मत के आधार पर होता है। इनके प्रत्येक सदस्य को केवल एक मत डालने का अधिकार होता है चाहे उसके पास समिति के कितने ही अशं क्यों ना हो। अत: कोई भी व्यक्ति अधिक अशं खरीदकर मतो के आधार पर प्रबंध व्यवस्था में मनमानी नहीं कर सकता।
मुख्य उद्देश्य सेवा:- इनका मुख्य उद्देश्य अपने सदस्यों की अधिकतम संभव सहायता करना है। अधिकतम संभव सहायता करने से यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि यह समितियां लागत पर ही वस्तुएं एवं सेवाएं प्रदान करती हैं, बल्कि उचित लाभ वसूल करते हुए अपने सदस्यों की सहायता करती हैं।
मताधिकार की समानता:- क्योंकि इन पर ' एक व्यक्ति एक मत' का सिद्धांत लागू होता है इसलिए प्रत्येक सदस्यों को एक मत डालने का अधिकार होता है। अतः सदस्य द्वारा खरीदे गए अंशों की संख्या का मताधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
नगद व्यापार:- सहकारी समितियों के पास अपेक्षाकृत कम वित्तीय साधन होने के कारण यह नगद व्यापार को प्राथमिकता देती हैं, लेकिन ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है कि ये समितियां उधार माल नहीं बेच सकती हैं।
वित्त की व्यवस्था:- सहकारी समितियों को वित्त प्रदान करने के मुख्य स्रोत इस प्रकार हैं:-
सदस्यों को बेचे गए अंशों से प्राप्त पूंजी।
सरकार से प्राप्त ऋण।
सरकार से प्राप्त अनुदान आदि।
सरकारी नियंत्रण:- यद्यपि समितियां ऐच्छिक संघ के रूप में होती हैं लेकिन सरकार समय-समय पर इनके लेखो का निरीक्षण करके इन पर नियंत्रण रखती है। इसी उद्देश्य से Sahkari Samiti को अपनी वार्षिक रिपोर्ट एवं लेख को रजिस्ट्रार के पास भेजने होते हैं।
सहकारी समिति की स्थापना अथवा पंजीकरण:-
सहकारी समिति की स्थापना अथवा पंजीकरण सहकारी समिति अधिनियम 1912 के अंतर्गत होता है। बंगाल, बिहार, उड़ीसा, महाराष्ट्र और चेन्नई में अपने अलग समिति अधिनियम है। प्रत्येक राज्य में एक सहकारी समिति रजिस्ट्रार होता है। जो लोग Sahkari Samiti स्थापना करना चाहते हैं उन्हें संबंधित रजिस्ट्रार के पास प्रार्थना पत्र देना होता है। प्रार्थना पत्र में निम्नलिखित सूचनाएं दी जाती हैं:-
प्रस्तावित समिति का नाम।
प्रस्तावित समिति का उद्देश्य।
अंश पूंजी का विवरण।
सदस्यों के अधिकार, कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व।
सदस्यता प्राप्ति की विधि।
कम से कम 10 सदस्यों के नाम एवं पते।
समिति के नियम।
यदि रजिस्ट्रार प्रार्थना पत्र में दी गई सूचनाओं से संतुष्ट हो जाता है तो सहकारी समिति का रजिस्ट्रेशन कर दिया जाता है। समिति का रजिस्ट्रेशन होते ही उसे पृथक वैधानिक अस्तित्व प्राप्त हो जाता है अर्थात समिति को अपने नाम से संपत्ति रखने, अनुबंध करने तथा दूसरे के विरुद्ध मुकदमा दायर करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।
सहकारी समिति के अधिकारी:-
Sahkari Samiti को चलाने के लिए सदस्य कुछ अधिकारियों का चयन करते हैं वह अधिकारी निम्नलिखित है:-
प्रधान।
उप प्रधान।
सचिव।
खजांची।
प्रत्येक 2 वर्ष के बाद समिति के अधिकारियों को पुनः चयन किया जाता है।
सहकारी समितियों के प्रकार:-
कार्य की प्रकृति के आधार पर सहकारी समितियों को उनके भागों में बांटा जा सकता है। मुख्य Sahkari Samiti निम्नलिखित है:-
उपभोक्ता सहकारी समितियां।
उत्पादक सहकारी समितियां।
सहकारी विपणन समितियां।
सहकारी साख समितियां।
सहकारी खेतिहर समितियां।
सहकारी गृह समितियां।
सहकारी संगठन के लाभ:-
सरल स्थापना:- सहकारी समिति एक ऐच्छिक संगठन के रूप में सरलता से स्थापित की जा सकती है। कोई भी 10 व्यस्क व्यक्ति सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार से पंजीकरण करवा कर सहकारी समिति स्थापित कर सकते हैं। इसके लिए कोई विशेष मुश्किल तथा महंगी वैधानिक कार्यवाही की आवश्यकता नहीं होती।
सीमित दायित्व:- इस संगठन में सदस्यों का दायित्व उनके अशों अथवा उनके द्वारा दी गई गरांटी तक सीमित होता है।
स्थायित्व:- पृथक वैधानिक स्थिति होने के कारण सहकारी समिति में स्थायित्व का गुण पाया जाता है अर्थात सदस्यों की मृत्यु तथा उनके दिवालिया होने का समिति के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
प्रजातांत्रिक प्रबंध:- सहकारी संगठन में प्रतिनिधियों का चुनाव एक सदस्य एक मत के आधार पर किया जाता है। इनका क्षेत्र सीमित होने के कारण लगभग सभी सदस्य सभाओं में उपस्थित होकर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं तथा सभाओं में Proxy की अनुमति नहीं होती।
कम क्रियात्मक खर्चे:- प्राय: Sahkari Samiti के प्रशासनिक खर्चे बहुत कम होते हैं क्योंकि अनेक सदस्य बिना कुछ प्रतिफल लिए ही प्रबंधकीय सेवाएं प्रदान करते हैं। समितियों को विक्रय बढ़ाने के लिए विज्ञापन आदि की जरूरत नहीं होती तथा लगभग सारा विक्रय नगद होने का कारण डूबत ऋण की हानि भी नहीं होती।
कर लाभ:- सहकारी समितियों को अपनी आय पर आयकर में छूट दी जाती है। इनको स्टैंप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन फीस आदि में भी छूट दी जाती है।
सरकारी संरक्षण:- सरकार सहकारी समितियों को वित्तीय अनुदान एवं आसान शर्तों पर ऋण देकर उनकी सहायता करती है। क्योंकि इन समितियों का उद्देश्य समाज के गरीब लोगों का विकास करना है इसलिए सरकार का इनके प्रति उदार रवैया रहता है।
सस्ती दर पर वस्तुएं उपलब्ध कराना:- क्योंकि समितियां वस्तुएं सीधे ही थोक व्यापारियों अथवा उत्पादकों से बड़ी मात्रा में खरीदती है इसलिए इनको वस्तुएं सस्ती दर पर उपलब्ध हो जाती है। यही कारण है कि यह समितियां अपने सदस्यों को बाजार से कम दर पर वस्तु विक्रय करके उनको लाभ पहुंचाती हैं।
दूसरे व्यवसायों पर नियंत्रण:- एक Sahkari Samiti के समाने व्यवसाय करने वाले अन्य व्यवसायियों को अपने माल का मूल्य व किस्म निर्धारित करते समय समिति के मूल्य व किस्म को भी ध्यान में रखना पड़ता है, इसके फलस्वरूप वे वस्तुओं का अधिक मूल्य लेकर उपभोक्ताओं का शोषण नहीं कर सकते हैं। अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि आज उपभोक्ता व्यवसायियों की दया पर निर्भर नहीं है बल्कि उनके पास सहकारी समितियों के रूप में एक शक्तिशाली हथियार है जिसके द्वारा वे अपना कल्याण स्वयं कर सकते हैं। अतः अधिक सहकारी समितियां स्थापित होने के डर से अन्य व्यापारी माल की किस्म अच्छी व मूल्य कम रखने पर मजबूर हो जाते हैं।
आर्थिक विकेंद्रीकरण:- Sahkari Samiti ने देश के धन को बड़े-बड़े व्यापारियों के हाथों में एकत्रित होने से बचाया है व्यवसायी पहले उपभोक्ता से अधिक विक्रय मूल्य लेकर अधिकाधिक लाभ कमाते थे और धन जमा करते थे। लेकिन अब यह प्रवृत्ति लगभग समाप्त हो गई हैं।
सहकारी संगठन की सीमाएं:-
पूंजी की कमी:- सहकारी समितियों के सदस्य प्राय: वित्तीय रूप से कमजोर तथा सीमित क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति होते हैं। अतः यह लोग एक सहकारी समिति में सीमित पूंजी ही लगा पाते हैं। दूसरी और लाभांश की सीमित दर तथा एक सदस्य एक मत का सिद्धांत भी इनके विनियोग को हतोत्साहित करते हैं।
अकुशल प्रबंध:- सहकारी समितियों का प्रबंध स्वयं ही उनके सदस्यों द्वारा किया जाता है। जो कि प्रबंध के ज्ञान के अभाव में समिति का संचालन प्रभावपूर्ण ढंग से नहीं कर सकते हैं और कुशल प्रबंधन का दूसरा कारण है वेतन हीन सदस्य द्वारा प्रबंध, जो धार्मिकता के बहाव में आकर प्रबंध समिति के सदस्य तो बन जाते हैं लेकिन प्रतिफल के अभाव में समिति के कार्य में रुचि नहीं लेते।
नगद विक्रय:- नकद विक्रय Sahkari Samiti का लाभ भी है और हानि भी इनके सदस्य प्रायः गरीब लोग होते हैं जिनको उधार माल की आवश्यकता होती है। यद्यपि सहकारी समिति उनको कम मूल्य पर माल उपलब्ध कराती है लेकिन उधार सुविधा के अभाव में उन्हें अन्य व्यवसायियों के चुंगल में फंसना ही पड़ता है।
प्रेरणा की कमी:- Sahkari Sangathan एक जन-समूह की सामूहिक संस्था होने के कारण, कोई भी सदस्य उसके कार्य में व्यक्तिगत रुचि नहीं लेता है। व्यक्तिगत प्रेरणा के अभाव से सभी यह सोचकर चुप बैठ जाते हैं कि वही काम क्यों कर रहे हैं। अतः जिस उद्देश्य के लिए इसकी स्थापना की जाती वो पूरा ही नहीं हो पाता।
जनता के विश्वास में कमी:- प्राय: यह देखा जाता है कि कुछ विशेष व्यक्ति ही इनकी प्रबंधकीय समिति के सदस्य बन जाते हैं। जो कि राजनीति से प्रेरित होते हैं उनका घटिया व्यवहार देखकर जनता का सहकारी समितियों से विश्वास उठ जाता है।
गोपनीयता का भाव:- Sahkari Samiti को अपनी वार्षिक रिपोर्ट और खाते रजिस्ट्रार के पास भेजने होते हैं इस प्रकार व्यवसाय की गोपनीय बातें भी सबके सामने आ जाती है।
आपसी झगड़े:- प्राय: यह देखा जाता है कि जिस जोश के साथ Sahkari samiti स्थापित की जाती हैं। कुछ ही समय बाद वह ढीला पड़ जाता है इसका कारण यह होता है कि कुछ सदस्य इनके माध्यम से अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं तो दूसरे सदस्य इस का विरोध करते हैं जिसके परिणाम स्वरुप आपसी झगड़े होने लगते हैं और संस्था विकास के स्थान पर गिरावट क्यों जाने लगती है।
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